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हास्य नाटक ‘गधे दी बारात’ ने मचाई धूम, जमाया ठहाकों का रंग

वसंत ऋतु रंग नाट्य महोत्सव सफलतापूर्वक सम्पन्न

पटियाला, 27 फ़रवरी

प्रसिद्ध हास्य नाटक गधे दी बारात की शानदार प्रस्तुति के साथ यहां कला कीर्ति पटियाला और नटराज आर्ट्स थियेटर द्वारा फेस्टिवल डायरेक्टर परमिंदर पाल कौर तथा गोपाल शर्मा की अगवाई में, नॉर्थ ज़ोन कल्चरल सेंटर पटियाला के सहयोग से आयोजित दो दिवसीय वसंत ऋतु रंग नाट्य महोत्सव का समापन हो गया।

नामवर थियेटर प्रमोटर विश्वदीपक त्रिखा के निर्देशन में कल्चरल सोसाइटी रोहतक के कलाकारों द्वारा मंचित इस नाटक की 350वीं प्रस्तुति ने वर्तमान सामाजिक-राजनीतिक परिस्थितियों पर तीखा व्यंग्य करते हुए दर्शकों की खूब वाहवाही बटोरी। मूल रूप से मराठी में हरिभाई वडगांवकर द्वारा लिखित और हिंदी में रमेश राजहंस व राजेंद्र मेहरा द्वारा रूपांतरित इस नाटक ने जहां दर्शकों को ठहाके लगाने पर मजबूर किया, वहीं अंत में उनकी संवेदनाओं को झकझोरते हुए गमगीन भी कर दिया।

गधे की बारात नाटक एक पौराणिक कथा पर आधारित है। इंद्रदेव के दरबार में चित्रसेन गंधर्व, सुरा के नशे में नृत्य करती अप्सरा रंभा का हाथ पकड़ लेता है। क्रोधित इंद्र उसे श्राप देता है कि वह मृत्युलोक में गधा बनकर भटकेगा। माफी मांगने पर इंद्र वरदान भी देता है कि जब उसकी शादी वहां के किसी राजा की बेटी से होगी, तब उसे इस श्राप से मुक्ति मिल जाएगी।

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चित्रसेन पृथ्वी पर गधा बनकर कल्लू कुम्हार के घर में रहने लगता है। कल्लू कुम्हार उसे अपने बच्चों की तरह पालता-पोसता है। एक दिन राजा घोषणा करता है कि जो कोई एक रात में महल की ड्योढ़ी से मुफलिसों की बस्ती तक पुल बना देगा, उसकी शादी राजकुमारी से होगी। गधा बना चित्रसेन शर्त पूरी कर पुल बना देता है। अब राजा परेशान हो जाता है कि गधे से अपनी बेटी की शादी कैसे हो? लेकिन वादा होने के कारण शादी करनी पड़ती है। जैसे ही जयमाला डाली जाती है, गंधर्व अपने असली रूप में आ जाता है और अपनी असलियत बताता है। इंसान बनते ही वह अपने पालने-पोसने वाले कल्लू कुम्हार और गंगी को पहचानने से इनकार कर देता है, उन्हें दुत्कारता है और अकेला छोड़कर राजा के महल में चला जाता है।

नाटक यह दिखाता है कि जब कोई गरीब व्यक्ति अचानक अमीर बन जाता है, तो वह अपने गरीब साथियों को गरीबी से निकालने में मदद करने की बजाय उनसे मुंह फेर लेता है और अमीर वर्ग का हिस्सा बन जाता है। इस तरह अमीर-गरीब का फासला कभी खत्म नहीं होता। हास्य और व्यंग्य से भरपूर यह नाटक अपनी बात कहने में पूरी तरह सफल रहा।

नाटक में अविनाश सैनी ने कल्लू कुम्हार की मुख्य भूमिका निभाई और अपने सहज अभिनय से खूब रंग जमाया। डॉ. सुरेंद्र शर्मा ने बृहस्पति गुरु और चौपट राजा, तरुण पुष्प त्रिखा ने दीवान, शक्ति सरोवर त्रिखा ने इंद्र, जगदीप जुगनू ने चित्रसेन, रिंकी बतरा ने गंगी, सोनिका सवेरा ने राजकुमारी एवं अप्सरा रंभा, तथा समीर शर्मा ने राजनर्तकी और द्वारपाल की भूमिका निभाई।

हरियाणा के प्रसिद्ध नगाड़ा वादक सुभाष नगाड़ा के संगीत से सजी प्रस्तुति में गुलाब सिंह ने हारमोनियम के साथ गायकी के रंग बिखेरे। मेकअप अनिल शर्मा ने तथा लाइट्स स्थानीय रंगकर्मी विनोद कौशल ने संभाले।

सप्तक के अध्यक्ष अविनाश सैनी ने बताया कि सप्तक द्वारा अब तक इस नाटक का भारत के विभिन्न शहरों के अलावा पाकिस्तान के लाहौर में भी मंचन हो चुका है। यह हरियाणा के किसी भी ग्रुप द्वारा किया गया पहला हिंदी नाटक है, जिसके 350 मंचन पूरे हो चुके हैं।

इस अवसर पर मुख्य अतिथि एवं अध्यक्ष मंडल में तेजिंदर मेहता (चेयरमैन, जिला प्लानिंग कमेटी पटियाला), आर्किटेक्ट एलआर गुप्ता, डॉ. गुरविंदर कांसलडॉ. प्रीतकमल कौर चीमा विशेष तौर से उपस्थित थे।

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