Homeहिंदीदेवों के देव महादेव की अर्धांगिनी "मां महागौरी"

देवों के देव महादेव की अर्धांगिनी “मां महागौरी”

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-माता दुर्गा का आठवां स्वरुप
चैत्र नवरात्र में मां दुर्गा के नौ रुपों में से आठवां स्वरुप मां महागौरी देवों के देव महादेव भगवान शंकर की अर्धांगिनी मां पार्वती का ही असल स्वरुप है। । मां दुर्गा के महागौरी के इस स्वरुप में पूजन करने से मां भक्तों के दुख औऱ पापों का नाश करती है। आज आपको मां महागौरी के इस पावन रुप के अवतरित होने के बारे आपको विस्तार से जानकारी देते हैं।

माता का अवतरण
मां महागौरी के अवतरित होने के बारे कई कथाएं प्रचलित हैं। पहली कथा अनुसार मां महागौरी ने देवी पार्वती रूप में देवों के देव भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए कठोर तपस्या की। एक बार भगवान भोलेनाथ, पार्वती जी को देखकर कुछ कह देते हैं। जिससे देवी के मन का आहत हो जाता है। तब माता पार्वती जी तपस्या में लीन हो जाती हैं। वषों तक कठोर तपस्या में लीन पार्वती जी के वापिस न आने पर भगवान शिव उनके पास पहुंचते हैं। पार्वती जी को देखकर शिव शंकर आश्चर्य चकित रह जाते हैं। पार्वती जी का रंग अत्यंत ओजपूर्ण होता है, उनकी छटा चांदनी के सामन श्वेत और कुन्द के फूल के समान धवल दिखाई पड़ती है, उनके वस्त्र और आभूषण से प्रसन्न होकर देवी उमा को गौर वर्ण का वरदान देते हैं।
दूसरी कथा अनुसार भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए देवी ने कठोर तपस्या की। जिससे इनका शरीर काला पड़ने लग जाता है। देवी की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव जी उनके शरीर को गंगा जल से धोते हैं। तब देवी विद्युत के समान अत्यंत कांतिमान गौर वर्ण की हो जाती हैं। तब से ही उनका गौरी पड़ा। महागौरी के इस रूप में देवी करूणामयी, स्नेहमयी, शांत और मृदुल दिखाई देती हैं। देवी के इस रूप की प्रार्थना करते हुए देव और ऋषिगण ने यह श्लोक…
“सर्वमंगल मंग्ल्ये, शिवे सर्वार्थ साधिके. शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोस्तुते..”। उच्चारण किया।
मां महागौरी से संबंधित एक अन्य कथा प्रचलित है। इस कथानुसार एक सिंह काफी भूखा था। वह भोजन की तलाश में वहां पहुंचा, जहां देवी उमा तपस्या कर रही होती हैं। देवी को देखकर सिंह की भूख बढ़ गयी। परंतु वह देवी के तपस्या से उठने का इंतजार करते वहीं बैठ गया। इस इंतजार में वह लगातार कमज़ोर होता गया। देवी जब अपने तप से उठी तो सिंह की दशा देखकर उन्हें उस पर बहुत दया आई। तब मां उसे अपनी सवारी के रुप में ले लिया। क्योंकि सिंह ने भी उनके समान ही तपस्या की थी। इसलिए मां महागौरी का वाहन बैल और सिंह दोनों ही माने जाते हैं।

माता का स्वरुप
मां दुर्गाजी की आठवीं शक्ति का नाम महागौरी है। मां की उपमा शंख, चंद्र और कुंद के फूल से की गई है। इनकी आयु आठ वर्ष की मानी गई है। माता के समस्त वस्त्र एवं आभूषण श्वेत हैं। चार भुजाओं वाली मां महागौरी का वाहन वृषभ है। इनके उपर का दायां हाथ अभय मुद्रा और नीचे वाले दायें हाथ में त्रिशूल धारण किया हुआ है। उपर वाले बाएं हाथ में डमरू और नीचे का बायां हाथ वर-मुद्रा में हैं।

माता का पूजन

अष्टमी के दिन महिलाओं को अपने सुहाग की लंबी आयु के लिए देवी मां महागौरी को चुनरी भेंट करनी चाहिए। मां महागौरी का ध्यान, स्मरण, पूजन भक्तों के लिए बेहद कल्याणकारी है। मां महागौरी की पूजा से आलौकिक सिद्धियों की प्राप्ति होती है। सच्चे मन से पूजा करने वाले भक्तों की मां महागौरी सभी कष्ट दूर करती है। माता की इस मंत्र से पूजा करनी चाहिए।
या देवी सर्वभू‍तेषु माँ गौरी रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।
अर्थ : हे देवी मां! सर्वत्र विराजमान और मां गौरी के रूप में प्रसिद्ध अम्बे, आपको मेरा बार-बार प्रणाम है। हे देवी मां, मुझे सुख-समृद्धि प्रदान करो।

मां महागौरी की आऱती
जय महागौरी जगत की माया
जय उमा भवानी जय महामाया

हरिद्वार कनखल के पासा
महागौरी तेरा वहा निवास

चंदेर्काली और ममता अम्बे
जय शक्ति जय जय माँ जगदम्बे

भीमा देवी विमला माता
कोशकी देवी जग विखियाता

हिमाचल के घर गोरी रूप तेरा
महाकाली दुर्गा है स्वरूप तेरा

सती ‘सत’ हवन कुंड में था जलाया
उसी धुएं ने रूप काली बनाया

बना धर्म सिंह जो सवारी मैं आया
तो शंकर ने त्रिशूल अपना दिखाया

तभी मां ने महागौरी नाम पाया
शरण आने वाले का संकट मिटाया

शनिवार को तेरी पूजा जो करता
माँ बिगड़ा हुआ काम उसका सुधरता

भक्त बोलो तो सोच तुम क्या रहे हो।
महागौरी मां तेरी हरदम ही जय हो

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