मुंबई, 20 सितंबर (अमर नाथ प्रसाद )
अभिनेत्री, निर्देशक, निर्माता, समाजसेवी और प्रेरक वक्ता सुचंद्रा चंद्र, जिन्हें पेशेवर जगत में सुचंद्रा X वानिया के नाम से जाना जाता है, अब सनातनी महाकाव्य रामायण को नारी दृष्टिकोण से एक नए रूप में पाठकों के सामने प्रस्तुत करने जा रही हैं। उनकी पहली साहित्यिक कृति ‘इक्यावन नारी, एक रामायण’ एक उपन्यासात्मक पुनर्पाठ है, जिसमें रामायण के परिचित घटनाक्रम के साथ 51 महिलाओं के जीवन, त्याग, पीड़ा, विवेक और आंतरिक शक्ति को केंद्र में रखा गया है।
रामायण को आमतौर पर युद्ध, राजधर्म और पुरुष पात्रों की वीरता से जोड़कर देखा जाता है, लेकिन इसके प्रत्येक महत्वपूर्ण पड़ाव पर नारी शक्ति की गहरी और बहुआयामी उपस्थिति दिखाई देती है। सीता, कैकेयी, कौशल्या, सुमित्रा, मंदोदरी, शूर्पणखा, उर्मिला, तारा और अहिल्या जैसी प्रमुख महिला पात्रों के साथ-साथ अनेक ऐसी स्त्रियों की आवाजें भी हैं, जो समय के साथ कथा के मुख्य प्रवाह में पीछे छूट गईं।
‘इक्यावन नारी, एक रामायण’ में प्रत्येक महिला पात्र को केवल किसी की पत्नी, मां, पुत्री या बहन के रूप में नहीं, बल्कि एक स्वतंत्र व्यक्तित्व और अपनी भावनाओं, विचारों तथा निर्णयों वाली स्त्री के रूप में देखने का प्रयास किया गया है।
इन महिलाओं की कहानियां केवल प्राचीन महाकाव्य के पन्नों तक सीमित नहीं हैं। आज के जीवन में भी हम उनके अनुभवों की झलक अपने आसपास देख सकते हैं—रिश्तों, संघर्षों, जिम्मेदारियों, प्रतीक्षा, प्रेम और आत्मसम्मान के रूप में। कहीं उर्मिला की मौन प्रतीक्षा दिखाई देती है, कहीं सीता का स्वाभिमान, कहीं मंदोदरी की बुद्धिमत्ता और कहीं शूर्पणखा के तिरस्कार तथा भावनात्मक पीड़ा की प्रतिध्वनि। यही जुड़ाव इस कृति को पौराणिक काल और वर्तमान जीवन के बीच एक भावनात्मक सेतु बनाता है।
लेखिका ने कथा में सनातनी रामायण के मूल आदर्शों, आध्यात्मिकता और गरिमा को बनाए रखते हुए उसकी महिला पात्रों की भावनाओं और अनकही बातों को नई भाषा देने का प्रयास किया है। यहां नारी शक्ति को केवल विरोध के रूप में नहीं, बल्कि प्रेम, सहनशीलता, आत्मसम्मान, त्याग, निर्णय लेने के साहस और विपरीत परिस्थितियों में अपनी पहचान बनाए रखने की शक्ति के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
समाजसेवी और प्रेरक वक्ता के रूप में सुचंद्रा X वानिया ने सामाजिक वास्तविकताओं और महिलाओं के विविध संघर्षों को करीब से देखा और समझा है। उनके यही अनुभव इस साहित्यिक कृति की विचारधारा और चरित्र-निर्माण में भी दिखाई देते हैं। उन्होंने रामायण की महिला पात्रों के भावनात्मक अनुभवों और जीवन-संघर्षों को आधुनिक समाज की महिलाओं के अनुभवों से जोड़ने का प्रयास किया है।
सुचंद्रा चंद्र का मानना है कि सनातन दर्शन में नारी कभी निर्बल नहीं होती। वह सृजन का स्रोत, शक्ति का स्वरूप और सामाजिक मूल्यों की संवाहक है। इसी विचार के तहत उपन्यास में प्राचीन पात्रों को आधुनिकता के सांचे में ढालने के बजाय उनके समय, संस्कृति, आध्यात्मिकता और सामाजिक परिवेश के भीतर उनकी मानसिक दुनिया को समझने का प्रयास किया गया है।
साथ ही सहज भाषा और समकालीन भावनात्मक जुड़ाव के माध्यम से इस कथा को नई पीढ़ी के लिए भी प्रासंगिक बनाने की कोशिश की गई है।
सिनेमा और सामाजिक जागरूकता से जुड़े कार्यों के बाद साहित्य की दुनिया में सुचंद्रा X वानिया की यह नई यात्रा उनके रचनात्मक सफर का एक नया अध्याय है। उनके अन्य रचनात्मक कार्यों की तरह इस कृति में भी नारी सम्मान, मानवीय संवेदनाओं और भारतीय संस्कृति की जड़ों के प्रति उनकी प्रतिबद्धता दिखाई देती है।
‘इक्यावन नारी, एक रामायण’ केवल पौराणिक महिला पात्रों पर आधारित उपन्यास नहीं है। यह उन महिला आवाजों को तलाशने का साहित्यिक प्रयास है, जो समय के साथ कथा के पीछे छूट गईं। साथ ही यह नारीत्व की आंतरिक शक्ति और सनातनी महाकाव्य को एक संवेदनशील तथा विशिष्ट नारी चेतना के माध्यम से नए सिरे से अनुभव करने का प्रयास भी है।





