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नेपाल में यहां हुआ था भगवान श्री राम और माता सीता का स्वंयवर

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– 115 सरोवरों वाला जानकी मंदिर

प्रदीप शाही

त्रेतायुग में भगवान श्री विष्णु हरि जी के अवतार भगवान श्री राम और माता लक्ष्मी जी की अवतार माता सीता अवतरित हुई। भगवान श्री राम ने महाराजा दशरथ के परिवार में और देवी सीता ने धरती माता की गोद से इस धरती पर जन्म लिया। माता सीता जी का पालन पोषण मिथिला के राजा जनक के परिवार में हुआ। यह सब तो हम सब जानते हैं। परंतु क्या आप यह जानते हैं कि भगवान श्री राम और माता सीता का स्वंयवर कहां हुआ था। यह पावन मंदिर कहां पर स्थित है। आईए आपको इस पावन स्थान के बारे विस्तार से जानकारी प्रदान करते हैं।

कहां है विद्यमान है यह मंदिर ?

राजा जनक मिथिला के राजा जनक थे और उनकी राजधानी का नाम था जनकपुर। यह स्थान मौजूदा समय नेपाल में है। इतना ही नहीं यह एक प्रसिद्ध धार्मिक स्थल के रुप में लोगों की आस्था का केंद्र भी बना हुआ है। रामायण काल में भगवान श्री राम और देवी सीता का स्वयंवर इस पावन स्थान पर संपन्न हुआ था। रामायणकाल का जनकपुर नेपाल की राजधानी काठमांडू से 400 किलोमीटर दक्षिण पूर्व में बसा हुआ है। जनकपुर के निवासी इस स्थान को भगवान श्री राम की ससुराल कहते हैं। क्योंकि यहां पर ही देवी सीता संग भगवान श्री राम का स्वंयवर हुआ था। जिस पवन स्थान पर भगवान श्री राम का देवी सीता संग स्वंयवर हुआ था। यह जगह मौजूदा समय में जानकी मंदिर के नाम से विख्यात है। इस नगर में ही देवी सीता का बचपन व्यतीत हुआ था। और जब देवी सीता युवा हुई, तो यहीं पर उनका स्वयंवर संपन्न हुआ।

मंदिर में है, पाषाण रुप में हैं शिव धनुष के अवशेष मौजूद

जानकी मंदिर में स्वंयवर से पहले भगवान श्री राम ने देवों के देव महादेव का धनुष भंग किया था। माना जाता है कि उस स्थान आज भी टूटे हुए धनुष के अवशेष पाषाण रुप में मौजूद है। इस स्थान को धनुषा नामक विवाह मंडप भी कहा जाता है। इस पावन स्थान पर आज भी विवाह पंचमी के दिन पूरी रीति-रिवाज से राम-जानकी का विवाह किया जाता है। आज भी जनकपुर स्थित जानकी मंदिर में विवाह पंचमी के अवसर पर भव्य आयोजन किए जाने की परंपरा है।

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टीकमगढ़ की महारानी वृषभानु कुमारी ने करवाया था इस मंदिर का निर्माण

इस पावन जानकी माता मंदिर का निर्माण टीकमगढ़ की महारानी वृषभानु कुमारी ने करवाया था। पुत्र प्राप्ति की कामना से महारानी वृषभानु कुमारी यहां बैठ कर पूजन किया। इसी स्थान पर एक बैरागी शुरकिशोरादस नामक एक संत को धरती में से माता सीता की एक मूर्ति मिली थी, जो सोने की थी। महारानी ने 1895 ईस्वी में इस स्थान पर ही जानकी मंदिर का निर्माण करवाया। तब महारानी ने ही संत को मिली देवी सीता की स्वर्ण मूर्ति को मंदिर के प्रांगण में प्राण-प्रतिष्ठित किया। जानकी मंदिर साल 1911 में बनकर तैयार हुआ था। यह मंदिर 48सौ वर्ग फीट से अधिक रकबे में फैला हुआ है। उस समय मे इस मंदिर के निर्माण पर नौ लाख रुपए से अधिक का खर्च आया था। इसलिए इस मंदिर को नौलक्खा मंदिर भी कहा जाता है। सबसे अहम बात यह है कि इस मंदिर में वर्ष 1967 से लगातार सीता-राम नाम का जाप और अखंड कीर्तन चल रहा है। इस मंदिर को जनकपुरधाम भी कहा जाता है। मंदिर के विशाल परिसर के आसपास कुल मिलाकर 115 सरोवर हैं। इसके अलावा कई कुंड भी विद्यमान हैं। जो गंगासागर, परशुराम कुंड और धनुष-सागर के नाम से पहचाने जाते हैं।

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यदि आप सनातन धर्म को नजदीक से जानने के इच्छुक हैं। तो इस तरह के आलेख को जरुर पढ़ें। इस तरह के आलेख की श्रृंखला अनवरत जारी रखने की हमारी कोशिश है। इतना ही नहीं यदि आप नेपाल जा रहे हैं, तो इस पावन मंदिर के दर्शन जरुर कर भगवान श्री राम और माता सीता का आशीर्वाद हासिल करें।

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