Homeहिंदीधर्मअष्ट भुजा वाहिनी, ब्रह्मांड रचयिता "माता कूष्माण्डा"

अष्ट भुजा वाहिनी, ब्रह्मांड रचयिता “माता कूष्माण्डा”

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-नवरात्रि का चौथा दिन

हम जब भी अपने किसी भी आराध्य की अराधना करते हैं, या किसी के समक्ष अपना मस्तक झुकाते हैं, तो हमें उसका आशीर्वाद अवश्य प्राप्त होता है। चैत्र नवरात्रि के पावन अवसर पर दुष्ट संहारिनी माता दुर्गा के चौथे रुप मां कूष्मांडा का विधिवत पूजन करने की परंपरा है। माता दुर्गा के इस स्वरुप मां कूष्मांडा का ब्रह्मांड की रचयिता के नाम से भी पूजन किया जाता है। आज आपको माता के सभी स््वरुपों शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी व सिद्धिरात्री में से माता दुर्गा के चौथे स्वरुप कूष्मांडा माता के पूजन के बारे जानकारी प्रदान करते हैं।

आदिशक्ति, आदिस्वरुपा, ब्रह्मांड रचयिता है माता कूष्मांडा

चैत्र नवरात्र पूजन के चौथे दिन माता कूष्माण्डा देवी के स्वरूप के पूजा अर्चना करने का विधान है। जो कोई भी इस दिन पवित्र मन से कूष्माण्डा देवी के स्वरूप को ध्यान में रखकर उपासना करती है। उसे मां का आशीर्वाद, प्यार हासिल होता है। कहा जाता है कि जब सृष्टि का अस्तित्व नहीं था, तब माता कूष्मांडा ने ही  ब्रह्मांड का सृजन किया था। सृष्टि के सृजन के चलते ही माता को आदि-स्वरूपा, आदिशक्ति भी कहा जाता हैं। माता का निवास सूर्यमंडल के भीतर के लोक में माना जाता है। तभी तो उनका तेज सूर्य समान है। वहां पर निवास करने की क्षमता और शक्ति केवल माता कूष्मांडा में ही है।  

माता की उपासना से मिटते हैं सभी रोग

मां कूष्माण्डा की उपासना से भक्तों के समस्त रोग और दुख मिट जाते हैं। माता की भक्ति से आयु, यश, बल और आरोग्य की वृद्धि होती है। माता कूष्माण्डा सेवा और भक्ति से प्रसन्न होती हैं। यदि मनुष्य सच्चे हृदय से इनकी शरण में जाता है, तो माता भक्त के सभी कष्टों का निवारण करती है। खास कर नवरात्रि के चौथे दिन मां कूष्मांडा की आराधना की जाती है। संस्कृत भाषा में कूष्माण्डा को कुम्हड़ भी कहते हैं। बलियों में कुम्हड़े की बलि इन्हें सर्वाधिक प्रिय है। इस कारण से भी इन्हें मां कूष्माण्डा कहा जाता है।

सिंह पर सवार है अष्ट भुजा धारण किए माता कूष्मांडा

सिंह पर सवार माता कूष्मांडा के तेज और प्रकाश से सभी दिशाएं प्रकाशित हो रही हैं। माता की आठ भुजाएं हैं। अष्टभुजा देवी के नाम से भी पहचान रखने वाले माता के सात हाथों में क्रमशः कमंडल, धनुष, बाण, कमल-पुष्प, अमृतपूर्ण कलश, चक्र तथा गदा है। आठवें हाथ में सभी सिद्धियों और निधियों को देने वाली जपमाला है।

माता की उपासना से मिटते हैं सभी रोग

मां कूष्माण्डा की उपासना से भक्तों के समस्त रोग और दुख मिट जाते हैं। माता की भक्ति से आयु, यश, बल और आरोग्य की वृद्धि होती है। माता कूष्माण्डा सेवा और भक्ति से प्रसन्न होती हैं। यदि मनुष्य सच्चे हृदय से इनकी शरण में जाता है, तो माता भक्त के सभी कष्टों का निवारण करती है। खास कर नवरात्रि के चौथे दिन मां कूष्मांडा की आराधना की जाती है। संस्कृत भाषा में कूष्माण्डा को कुम्हड़ भी कहते हैं। बलियों में कुम्हड़े की बलि इन्हें सर्वाधिक प्रिय है। इस कारण से भी इन्हें मां कूष्माण्डा कहा जाता है।

मां का स्तुति मंत्र

या देवी सर्वभू‍तेषु माँ कूष्माण्डा रूपेण संस्थिता।

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।’

अर्थ : हे देवी मां! सर्वत्र विराजमान और कूष्माण्डा के रूप में प्रसिद्ध अम्बे, आपको मेरा बार-बार प्रणाम है। हे माँ, मुझे सब पापों से मुक्ति प्रदान करें।

पूजन

नवरात्रि के चौथे दिन भक्तों को बड़े माथे वाली तेजस्वी विवाहित महिला का पूजन करना चाहिए। उन्हें भोजन में दही, हलवा खिलाना चाहिए। इसके बाद फल, सूखे मेवे का सामान भेंट करना चाहिए।

माता की आरती

कुष्मांडा जय जग सुखदानी
मुझ पर दया करो महारानी
पिंगला ज्वालामुखी निराली
शाकम्बरी माँ भोली भाली
लाखो नाम निराले तेरे
भगत कई मतवाले तेरे
भीमा पर्वत पर है डेरा
स्वीकारो प्रणाम ये मेरा
संब की सुनती हो जगदम्बे
सुख पौचाती हो माँ अम्बे
तेरे दर्शन का मै प्यासा
पूर्ण कर दो मेरी आशा
माँ के मन मै ममता भारी
क्यों ना सुनेगी अर्ज हमारी
तेरे दर पर किया है डेरा
दूर करो माँ संकट मेरा
मेरे कारज पुरे कर दो
मेरे तुम भंडारे भर दो
तेरा दास तुझे ही ध्याये
‘चमन’ तेरे दर शीश झुकाए

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