
पटियाला, 26 सितंबर (प्रदीप शाही)
धार्मिक ग्रंथों में आत्मा को अजर-अमर माना गया है। इंसान की मृत्यु के बाद, उसकी आत्मा को प्रेत योनि से मुक्त कराने के लिए पितृ तर्पण का बहुत महत्व होता है। श्राद्ध का भाव अपने ईष्ट, पितरों और वंश के प्रति श्रद्धा-भाव प्रकट करना। माना जाता है कि यदि विधिपूर्वक श्राद्ध किया जाए, तो पितरों की आत्मा को मुक्ति मिल जाती है। भारत में 55 स्थलों पर पिंडदान की परंपरा अनादि काल चली आ रही है। क्या आप जानते हैं कि भारत में किन-किन स्थानों पर पितृ पक्ष और मातृ पक्ष का तर्पण किया जाता है।
देश में कहां-कहां होता है तर्पण?
भारत में हरिद्वार, गंगासागर, जगन्नाथपुरी, कुरुक्षेत्र, चित्रकूट, पुष्कर और बद्रीनाथ समेत 55 स्थानों पर श्राद्ध और पिंडदान की परंपरा सदियों से प्रचलित है। शास्त्रों के अनुसार, विशेष रूप से तीन स्थानों पर पिंडदान करना बहुत फलदायी माना गया है:
- ब्रह्मकपाल, बद्रीनाथ: यहां पितृ दोष से मुक्ति के लिए पिंडदान किया जाता है।
- नारायणी शिला, हरिद्वार: यहां पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए तर्पण होता है।
- गया, बिहार: पितृ पक्ष में फल्गु नदी के तट पर स्थित विष्णुपद मंदिर के पास पिंडदान करने से पितरों को मोक्ष की प्राप्ति होती है।
गरुड़ पुराण में वर्णित है कि घर से निकलकर गया पहुंचने तक का हर कदम पितरों के स्वर्गारोहण की एक-एक सीढ़ी का निर्माण करता है। गया का महत्व इसलिए भी है क्योंकि यहां मोक्ष के लिए पिंडदान करने की प्राचीन परंपरा है।

पिंडदान का महत्व और प्रक्रिया
हिंदू मान्यताओं के अनुसार, पिंडदान मोक्ष प्राप्ति का सबसे सरल मार्ग माना गया है। पिंड एक गोलाकार वस्तु को कहते हैं। श्राद्ध के समय, जौ या चावल के आटे को गूंथकर बनाई गई गोलाकृति को पिंड कहा जाता है। इसे श्रद्धा-भाव से अपने पितरों को अर्पित करना ही पिंडदान कहलाता है। इसके साथ ही, काले तिल, जौ, कुश और सफेद फूल मिलाकर जल से तर्पण किया जाता है। इस प्रक्रिया से पितर तृप्त होते हैं और उनकी आत्मा को शांति प्राप्त होती है।
पिंडदान का महत्व और कथा
पिंडदान का महत्व गयासुर नामक राक्षस की कथा से जुड़ा है। किवदंती के अनुसार, गयासुर ने कठोर तपस्या कर भगवान ब्रह्मा से वरदान मांगा था कि उसके दर्शन मात्र से लोग पाप मुक्त हो जाएं। इस वरदान के चलते स्वर्ग की जनसंख्या तेजी से बढ़ने लगी और लोग गयासुर के दर्शन से पाप मुक्त होते रहे। देवताओं ने इस समस्या से निपटने के लिए गयासुर से एक पवित्र स्थल मांगा, तो उसने अपना शरीर ही यज्ञ के लिए सौंप दिया। गयासुर का शरीर जहां लेटा, वह क्षेत्र आज “गया” के नाम से जाना जाता है।
गया को पितरों के पिंडदान का स्थल माना गया है क्योंकि यहां पिंडदान करने से आत्मा को मुक्ति मिलती है। साथ ही, लोग मानते हैं कि श्राद्ध के समय पितर पृथ्वी पर किसी न किसी रूप में आते हैं और अपनी संतानों के तर्पण से तृप्त होते हैं।

गया में पिंडदान का महत्व
बिहार के गया में पिंडदान का बहुत महत्व है। मान्यता है कि भगवान राम और देवी सीता ने यहां राजा दशरथ की आत्मा की शांति के लिए पिंडदान किया था। महाभारत में उल्लेख है कि फल्गु तीर्थ में स्नान करने और भगवान गदाधर (भगवान विष्णु) के दर्शन करने से पितरों के ऋण से मुक्ति मिलती है। इस कारण गया को “विष्णु नगर” और “मोक्ष की भूमि” भी कहा जाता है। यहां पिंडदान करने से पूर्वजों को मोक्ष प्राप्त होता है और उनकी आत्मा स्वर्ग में वास करती है।
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मातृ पक्ष का तर्पण कहां होता है?
गुजरात के सिद्धपुर “सिद्ध स्थल” के पावन बिंदु सरोवर में मातृ पक्ष का तर्पण किया जाता है। यह भारत का एकमात्र ऐसा स्थल है, जहां मातृ पक्ष का श्राद्ध किया जाता है। माना जाता है कि ऋषि परशुराम ने भी यहीं पर अपनी माता का श्राद्ध किया था। बिंदु सरोवर के किनारों पर पत्थर के घाट बने हुए हैं और इसके पास ही परशुराम का आश्रम और मोक्ष पीपल स्थित है, जहां पुत्र अपनी माता के मोक्ष के लिए प्रार्थना करते हैं।
गया में अब केवल 48 वेदियां शेष
मोक्ष भूमि के रूप में प्रसिद्ध गया में पहले 360 वेदियां थीं, जहां पिंडदान की परंपरा थी। लेकिन अब इनमें से केवल 48 वेदियां ही शेष हैं। फिर भी, यहां पिंडदान करने का महत्व आज भी उतना ही है जितना सदियों पहले हुआ करता था।




