-श्री गुरु ग्रंथ साहिब विभिन्न भाषाओं का सुंदर गुलदस्ता – जसवंत सिंह जफर
पटियाला, 14 अगस्त
पंजाब भाषा विभाग द्वारा संस्कृत दिवस के अवसर पर ‘श्री गुरु ग्रंथ साहिब की बाणी में संस्कृत’ विषय पर एक सेमिनार आयोजित किया गया। विभाग के निदेशक श्री जसवंत सिंह जफर की अगुवाई में आयोजित इस समारोह में श्री अकाल तख्त साहिब के पूर्व जत्थेदार सिंह साहिब प्रो. मंजीत सिंह मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित हुए। समारोह की अध्यक्षता संस्कृत के प्रख्यात लेखक और विद्वान डॉ. महेश चंद्र शर्मा गौतम ने की, जबकि आचार्य गुरदास सिंह ने मुख्य वक्ता के रूप में अपने विचार प्रस्तुत किए।
समारोह की शुरुआत पंजाबी यूनिवर्सिटी के गुरमति संगीत विभाग के प्रमुख डॉ. अलंकार सिंह और उनके सहयोगियों द्वारा श्री गुरु ग्रंथ साहिब में संस्कृत भाषा में दर्ज दो शब्दों के गायन के साथ हुई। अपने स्वागत भाषण में निदेशक श्री जसवंत सिंह जफर ने कहा कि श्री गुरु ग्रंथ साहिब विभिन्न भाषाओं और असंख्य बोलियों का एक सुंदर गुलदस्ता है। इतनी भाषाई विविधता विश्व के किसी अन्य ग्रंथ में नहीं मिलती। संस्कृत भी इस महान ग्रंथ में शामिल भाषाओं में से एक है। गुरु साहिबान ने शासकों की भाषा को स्वीकार करने के बजाय विभिन्न क्षेत्रों में बोली जाने वाली आम लोगों की बोलियों को बाणी का माध्यम बनाकर एक उत्कृष्ट ग्रंथ की रचना की। सिन्धु और यमुना नदियों के बीच सप्त सिंधु के प्राचीन नाम वाले पंजाब का यह क्षेत्र विभिन्न संस्कृतियों, भाषाओं और ज्ञान परंपराओं की सह-अस्तित्व और संवाद की भूमि है। संस्कृत को कभी इस क्षेत्र की भाषाओं की ‘नानी’ माना जाता था।
मुख्य वक्ता आचार्य गुरदास सिंह ने गुरबाणी में शामिल संस्कृत के शब्दों और श्लोकों के बारे में विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने विभिन्न गुरुओं और भक्तों द्वारा बाणी में प्रयुक्त संस्कृत शब्दों के अंतर-संबंधों पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि गुरबाणी समस्त मानवता की बाणी है, जिसे किसी मजहबी सीमा में बांधा नहीं जा सकता। श्री गुरु ग्रंथ साहिब 500 वर्षों में संकलित ज्ञान का शहद है।
समारोह की अध्यक्षता करते हुए डॉ. महेश चंद्र शर्मा गौतम ने कहा कि कोई भी भाषा हमेशा एकरूप नहीं रहती। समय के साथ इसका स्वरूप बदलता रहता है। उदाहरण के तौर पर, श्री गुरु ग्रंथ साहिब में प्रयुक्त पंजाबी हमारी वर्तमान भाषा से काफी भिन्न है। उन्होंने कहा कि गुरबाणी में जहां संस्कृत शामिल है, वहीं इससे विकसित हुई कई भाषाएं भी शामिल हैं। उन्होंने कहा कि भाषा के स्वरूप को किसी बंधन में बांधकर स्थायी नहीं रखा जा सकता; यह हमेशा बढ़ती, फलती-फूलती और विकसित होती रहती है।
मुख्य अतिथि सिंह साहिब प्रो. मंजीत सिंह ने कहा कि गुरु साहिबान ने श्री गुरु ग्रंथ साहिब का संकलन करते समय किसी भी भाषा को भेदभाव की नजर से नहीं देखा। उन्होंने केवल मानवता के लिए ज्ञान के खजाने को एकत्र किया। इसका प्रमाण विभिन्न भाषाओं और क्षेत्रों के भक्तों की बाणी को श्री गुरु ग्रंथ साहिब में शामिल करने से मिलता है। बाणी के माध्यम से गुरु साहिबान ने खुद को भाषाओं का विद्वान साबित करने की कोशिश नहीं की, बल्कि उनका एकमात्र लक्ष्य मानव को सही ढंग से जीने का मार्ग दिखाना था। उन्होंने कहा कि इस समय हम एक शर्मनाक माहौल से गुजर रहे हैं, जहां भाषाओं को संप्रदायों से जोड़कर एक-दूसरे के खिलाफ टकराव या विरोध के रूप में देखा जा रहा है, जबकि भाषाएं सभी मनुष्यों के लिए ज्ञान संचार की वाहक हैं।
इस अवसर पर सरकारी मल्टीपर्पज सीनियर सेकेंडरी स्कूल की छात्राओं विधि और दिव्या ने संस्कृत भाषा में संवाद प्रस्तुत किया। अतिथियों को विभाग की ओर से शॉल और पुस्तकों के सेट भेंट कर सम्मानित किया गया। अंत में, समारोह की संचालिका सहायक निदेशिका सुखप्रीत कौर ने सभी का धन्यवाद किया। इस अवसर पर प्रख्यात विद्वान डॉ. बलकार सिंह, डॉ. केहर सिंह, डॉ. जसवीर कौर, डॉ. बाबू राम दीवाना, श्रोमणि कवि दर्शन बुट्टर, बलविंदर संधू, डॉ. लक्ष्मी नारायण भीखी, कवि अवतारजीत, गुरचरण पबाराली, भाषा विभाग की उप निदेशिका हरभजन कौर और चंदनदीप कौर, सहायक निदेशक अमरिंदर सिंह, सुरिंदर कौर, जसप्रीत कौर, दविंदर कौर और बड़ी संख्या में श्रोता उपस्थित थे। मंच संचालन डॉ. मनजिंदर सिंह, खोज अधिकारी, ने किया।




