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वैदिक प्रस्थल से शाही शहर पटियाला, यहां है इतिहास समाहित

-262 सालों का गौरवमयी इतिहास

12 फऱवरी को है पटियाला का स्थापना दिवस

पटियाला, 11 फरवरी (प्रदीप शाही)

हर शहर की अपनी एक अनोखी प्राचीन विरासत होती है, जिसमें इतिहास के कई रोमांचक और अनछुए पहलू छिपे रहते हैं। इनमें से कुछ पहलू समय के साथ धुंधले पड़ जाते हैं, लेकिन कुछ शहर ऐसे होते हैं जो सदियों से अपनी पहचान को जीवंत रखते आए हैं। ऐसा ही एक शहर है पटियाला। जो अपने जीवन के 262 स्वर्णिम सालों के गौरावमयी इतिहास को अपने दामन में समेटे कर 12 फरवरी को पूरा करने जा रहा है।

पंजाब की इस रियासत की पहचान न केवल भारत में, बल्कि विश्व स्तर पर भी शाही ठाठ-बाट, सांस्कृतिक समृद्धि और ऐतिहासिक महत्व के लिए मशहूर रही है। पटियाला केवल एक शहर नहीं, बल्कि एक जीवंत इतिहास की किताब है, जिसमें वैदिक काल से लेकर आधुनिक समय तक की कहानियां बसी हैं। पटियाला केवल एक शहर नहीं, यह इतिहास, संस्कृति, संगीत, शिक्षा और खेलों का संगम है। इसकी गलियों में अतीत की आहट है और बागों में भविष्य की उम्मीदें। ऋग्वेद से लेकर आधुनिक भारत तक, यह शहर अपनी पहचान की लौ निरंतर जलाए हुए है। आइए, विस्तार से जानते हैं पटियाला की इस अनूठी विरासत के बारे में।

पटियाला की प्राचीन सांस्कृतिक जड़ें: ऋग्वेद से रियासत तक : पटियाला की गौरवगाथा

पटियाला की स्थापना आधिकारिक रूप से बाबा आला सिंह ने 12 फरवरी 1763 को की थी, जब उन्होंने किला मुबारक की नींव रखी। लेकिन इस शहर की पहचान इससे कहीं अधिक प्राचीन है। लोक परंपरा और कुछ ऐतिहासिक संदर्भों में पटियाला का उल्लेख वैदिक काल से जोड़ा जाता है। वैदिक युग में यह क्षेत्र प्रस्थल या प्रस्थावंत के नाम से जाना जाता था। ऋग्वेद में इस स्थान का संकेत मिलता है, जहां इसे एक प्राचीन क्षेत्र के रूप में वर्णित किया गया है। हालांकि, यह दावा मुख्य रूप से स्थानीय परंपराओं और लोककथाओं पर आधारित है, और आधुनिक इतिहासकार इसे पूरी तरह प्रमाणित नहीं मानते।

लंबे समय तक यह क्षेत्र खंडहर जैसा रहा, लेकिन बाबा आला सिंह की पट्टी (या पट्टी/पत्ती) के नाम से इसने नई पहचान पाई। इसे बाबा आला सिंह की कच्ची गढ़ी भी कहा जाता था। आज भी किला मुबारक में बाबा आला सिंह की ज्योति (जोत) निरंतर जल रही है, जो शहर की सुरक्षा और समृद्धि का प्रतीक मानी जाती है।

गुरु साहिब का विशेष आशीर्वाद: शाही परिवार की नींव

पटियाला के शाही परिवार को सिख गुरुओं का विशेष आशीर्वाद प्राप्त था। 1702 में गुरु हर राय जी मालवा क्षेत्र में पधारे, तब शाही परिवार के पूर्वज रूप चंद के भाई काला अपने भतीजों फूल और संदली के साथ आशीर्वाद लेने गए। गुरु जी ने आशीर्वाद दिया कि उनका वंश लंबे समय तक शासन करेगा।

बाद में, चौधरी फूल के पुत्र तलोक चंद और राम चंद को गुरु गोबिंद सिंह जी ने अमृत छकाकर तलोक सिंह और राम सिंह बनाया। गुरु जी ने उन्हें “तेरा घर मेरा घर” का हुक्मनामा भी प्रदान किया। चौधरी राम सिंह के समय पटियाला और आसपास के क्षेत्र पर उनका राज था। यह आशीर्वाद पटियाला रियासत की मजबूत नींव साबित हुआ।

बाबा आला सिंह के शासन की किदवंतियां

बाबा आला सिंह (जन्म 1691, मृत्यु 1765) के शासन से जुड़ी कई लोकप्रिय दंतकथाएं प्रचलित हैं। एक प्रसिद्ध कथा के अनुसार, एक महात्मा ने उनसे कुछ मांगने की इच्छा जताई। उस समय राजकाज उर्दू में होता था, तो बाबा आला सिंह ने कहा, “हमारा राज अल्फ से ये तक रहेगा।” उर्दू में अल्फ पहला अक्षर और ये आखिरी है। संयोग से पटियाला के पहले शासक आला सिंह और आखिरी शासक महाराजा यादवेंद्र सिंह (यादवेंद्र) थे—जिसमें नाम की शुरुआत और अंत ‘अ’ और ‘य’ से जुड़ती है। इसी कारण किला मुबारक में उनकी जोत आज भी जल रही है, ताकि शहर बुरी शक्तियों से सुरक्षित रहे।

पटियाला रियासत के शासक: एक क्रमबद्ध इतिहास

पटियाला रियासत पर शासन करने वाले प्रमुख महाराजा इस प्रकार हैं:

  • बाबा आला सिंह (1763–1765)
  • महाराजा अमर सिंह (1765–1782)
  • महाराजा साहिब सिंह (1782–1813)
  • महाराजा कर्म सिंह (1813–1845)
  • महाराजा नरेंद्र सिंह (1845–1862)
  • महाराजा महेंद्र सिंह (1862–1876)
  • महाराजा राजेंद्र सिंह (1876–1900)
  • महाराजा भूपेंद्र सिंह (1900–1938) — शाही वैभव और क्रिकेट के लिए प्रसिद्ध
  • महाराजा यादवेंद्र सिंह (1938–1948) — अंतिम शासक

1947 में भारत आजाद होने के बाद पटियाला रियासत को PEPSU (पटियाला एंड ईस्ट पंजाब स्टेट्स यूनियन) में शामिल किया गया। यादवेंद्र सिंह 1948 से 1956 तक राजप्रमुख रहे और बाद में डकाला से विधायक चुने गए।

पटियाला की सांस्कृतिक और रोमांचक पहचान

पटियाला की पहचान कई अनोखी चीजों से है:

  • पटियाला पैग (शराब का बड़ा माप)
  • पटियाला पगड़ी (शाही स्टाइल की पग)
  • परांदा (रंग-बिरंगे बालों के लिए)
  • नाले (फुलकारी वाले)
  • फुलकारी (सुई-कढ़ाई का कला)
  • जूती (शाही जूती)

शहर के पुराने गली-मोहल्ले आज भी जीवंत हैं: कनेरां वाली गली, अरना बरना चौक, घेर सोढियां, जंड गली, बहेड़ा रोड, त्रिवेणी चौक, अनाज मंडी, गुड़ मंडी, मिर्च मंडी, सब्जी मंडी, घास मंडी, मिश्री बाजार, अचार बाजार, सराफा बाजार।

शाही समाधियां, 10 शेरों वाला गेट, सुनामी गेट, लाहौरी गेट जैसे कई द्वार थे (कुछ अब अस्तित्व में नहीं)।

बागों का शहर: हरियाली और वास्तुकला

पटियाला को “बागों का शहर” कहा जाता है। राजाओं ने पर्यावरण संरक्षण पर जोर दिया। बारांदरी बाग (महाराजा राजेंद्र सिंह द्वारा) में 500 बीघा में 2800 पौधे लगाए गए, फ्रेंच-इंग्लिश शैली में। मोती बाग पैलेस (1847 में महाराजा नरेंद्र सिंह द्वारा) शालीमार बाग की तर्ज पर बना—तालाब, फव्वारे, शीश महल और लक्ष्मण झूला (तारों से लटका, हवा में हिलने वाला)। बारांदरी बाग में कोलकाता के बाग की तर्ज पर फर्न हाउस  का निर्माण महाराजा नरेंद्र सिंह ने करवाया। में 96 स्तंभ, 54 फव्वारे और 32 झाड़ियां थीं। गौर हो लाहौर स्थित शालीमार बाग की तर्ज पर मोती बाग पैलेस का निर्माण करवाया। इस पैलेस का निर्माण 1847 में किया गया

धार्मिक सद्भाव और प्रमुख स्थल

रियासत में सभी धर्मों के लिए जगह थी। किला मुबारक में बाबा आला सिंह की ज्योति और धूना जलता है। शिव मंदिर प्रमुख: तुंगनाथ, भूतनाथ, केदारनाथ (प्राकृतिक शिवलिंग, नेपाल के पशुपति से जुड़ा), बद्रीनाथ, श्री काली माता मंदिर (कर्म सिंह से शुरू, भूपेंद्र सिंह में पूरा; कोलकाता से ज्योति लाई गई)। गुरुद्वारा दुखनिवारण साहिब और गुरुद्वारा मोती बाग साहिब (गुरु तेग बहादुर जी की चरणधूलि प्राप्त),  माल रोड पर पीर बाबा रोडे शाह, आर्य समाज स्थित पीर लालां वाले की मजार प्रमुख है। पीर बाबा माछीवाड़ा के निवासी थे। महाराजा के निमंत्रण पर पर यहां आकर बस गए। पीर बाबा के दो अन्य मजार सब्जी मंडी व गुड़ मंडी में स्थित हैं।

शिक्षा, संगीत और कला का केंद्र

महाराजा नरेंद्र सिंह के समय शिक्षा का विस्तार हुआ। 1875 में महेंद्रा कॉलेज स्थापित। आज पटियाला में पंजाबी विश्वविद्यालय, थापर यूनिवर्सिटी, राजीव गांधी नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी, स्पोर्ट्स यूनिवर्सिटी आदि हैं।

पटियाला घराना संगीत में प्रसिद्ध: उस्ताद मियां कालू खां से शुरू, बड़े गुलाम अली खां ने नई ऊंचाई दी।

मौजूदा समय में डॉ. सुरिंदर कपिला, डॉ. अनिल नरुला, डॉ. नरेंद्र, डॉ. राजन नरुला, डॉ. डेजी वालिया पटियाला संगीत घराना की विरासत को संभाले हुए हैं।

पटियाला में चित्रकला का विकास महाराजा नरेंद्र सिंह के काल में हुआ। किला मुबारक में 1227 कक्ष थे। जो आझ केवल 25-26 तक सिमट कर रह गए हैं। यहां पर श्री कृष्ण लीला, महाभारत व रामायण काल के प्रसंग दीवारों पर उकेरे हुए थे। शीशमहल की दीवारों पर शीशे के टुकड़ों की नक्काशी दर्शनीय है।

खेलों का मक्का है पटियाला

खेलों की बात हो और पटियाला का नाम न लिया जाए। तो नाइंसाफी होगी। पारंपरिक खेलों का विकास तो बाबा आला सिंह के समय में ही हो गया था। उन्होंने घुड़सवारी, निशानेबाजी व शिकार को लोकप्रिय बनाया। जबकि महाराजा भूपेंद्र सिंह ने निशानेबाजी, महाराजा राजेंद्र सिंह ने क्रिकेट व पोलो, अमरेंद्र सिंह ने पोलो का समुचित विकास किया। मराहाजा के जरनैल चंदा सिंह ने 1923 में पोलो में रुतलाम कप जीता। वहीं 1924 में इंग्लेंड के कारोनेशन कप को अपनी जीत में जोड़ा। महाराजा भूपेंद्र सिंह ने 19 साल की आय़ु में 1911 में इंग्लेंड में आयोजित मुकाबले में क्रिकेट टीम की कप्तानी की। क्रिकेट में लाला अमरनाथ व  बालीवाल में सोमनाथ बतौर शिक्षा अधिकारी तैनात रहे। शिमला के चैल में और यादवेंद्रा स्टेडियम की स्थापना की। हाकी, एथलेटिक्स में यहां के खिलाड़ियों का खास योगदान रहा। हॉकी के सिरमौर खिलाड़ी मेजर ध्यान चंद का पटियाला से गहरा नाता रहा। जबकि पहलवानी में गामा पहलवान व इमाम बख्श ने विश्व भर में शहर का नाम रोशन किया। इसके बाद केसर का अखाड़ा के  पहलवान केसर सिंह. सुखचैन सिंह चीमा और अब पलविंदर चीमा भारत का नाम रोशन कर रहे है। पटियाला में विश्व स्तरीय नेता जी सुभाष नेशनल इंस्टीट्यटू आफ स्पोट्रर्स में हर साल बड़ी संख्या में कोच तैयार किए जाते है। साथ ही यहां पर ओलंपिक, कॉमनवेल्थ गेम्स, एशियन गेम्स के लिए ट्रेनिंग कैंपों का आयोजन किया जाता है।

विश्व को दी अनूठी सौगातें

  • पटियाला जूती — कसूर जूती को चुनौती दी।
  • परांदा — रंग-बिरंगे, बालों की शोभा।
  • फुलकारी — सदियों से कब्जा, शादी में 51 फुलकारियां देने की परंपरा।
  • पटियाला पग — विश्व भर में युवा पसंद करते हैं।

पटियाला एक ऐसा शहर है जहां इतिहास सांस लेता है, संस्कृति जीवंत है और विरासत आज भी गौरव का विषय बनी हुई है। यह न केवल पंजाब का गौरव है, बल्कि भारत की शाही और सांस्कृतिक धरोहर का प्रतीक है।

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