पटियाला, 16 सितंबर 2025
भाषा विभाग पंजाब द्वारा हिंदी दिवस को समर्पित एक कवि दरबार का आयोजन भाषा भवन में विभाग के निदेशक जसवंत सिंह जफर की अगुवाई में किया गया। इस समारोह में साहित्य अकादमी, दिल्ली के अध्यक्ष डॉ. माधव कौशिक मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए, जबकि प्रख्यात साहित्यकार डॉ. प्रेम विज ने समारोह की अध्यक्षता की।
अपने स्वागत भाषण में जफर ने कहा कि भाषा विभाग जहां पंजाबी के प्रचार-प्रसार के लिए निरंतर प्रयासरत है, वहीं हिंदी, संस्कृत और उर्दू के प्रसार के लिए भी समान रूप से सक्रिय है। उन्होंने कहा कि प्रत्येक भाषा का उद्देश्य संचार है, और किसी भी भाषा को सांप्रदायिक रंग में बांधना इसके प्रसार को रोकता है। इसलिए, हमें हर भाषा को सर्वव्यापी बनाने के लिए प्रयास करना चाहिए।
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कवि दरबार की शुरुआत डॉ. बिमला गुगलानी ने अपनी कविता ‘मेरा अभिमान है हिंदी’ के साथ की, जिसमें उन्होंने हिंदी के प्रति अपने प्रेम को व्यक्त किया। इसके बाद, डॉ. हरविंदर कौर ने ‘आजादी’ पर व्यंग्य करती कविता के माध्यम से इसके सही अर्थों को समझने पर जोर दिया। डॉ. धर्मपाल साहिल ने मोबाइल के मानव जीवन पर प्रभाव को लेकर एक व्यंग्यात्मक कविता प्रस्तुत की। डॉ. राजिंदर टोंकी ने ‘जहां रोज बदलता क्या है’ के माध्यम से समकालीन समाज और राजनीति पर तीखा कटाक्ष किया। डॉ. अनु गौड़ ने ‘वाह पंजाबी खाना रे’ के साथ दर्शकों का मनोरंजन किया। मीनाक्षी वर्मा ने ‘चलती का नाम हिंदी’ कविता के जरिए हिंदी भाषा के प्रसार पर प्रकाश डाला। डॉ. बलविंदर सिंह ने ‘तुम मुझे खोजना’ के माध्यम से प्रकृति के साथ एकाकार होने का प्रयास किया। डॉ. सुरेश नायक ने अपनी कविता ‘खाली होने का दर्द’ के जरिए अकेलेपन से जूझ रहे व्यक्ति की मार्मिक तस्वीर पेश की। डॉ. परविंदर शोख ने अपनी गजल के माध्यम से भाषाओं की खूबसूरती और धर्म के नाम पर पाखंड करने वालों की सच्चाई उजागर की। भावना ने अपनी नज्म के जरिए महिलाओं के सम्मान के झूठे दावों पर व्यंग्य किया। डॉ. पंकज कपूर ने ‘वो शोर नहीं करते जो गहरे होते हैं’ के माध्यम से बुद्धिमान व्यक्तियों के गुणों का उल्लेख किया। अमृतपाल कॉफी ने अपनी नज्म ‘कविता’ के जरिए कलम की बहुमुखी विशेषताओं पर प्रकाश डालते हुए माहौल में जोश भरा। डॉ. मोहिंदर सिंह जागी ने अपनी कविता में पानी की बूंद से समुद्र बनने तक के सफर को दर्शाया। समारोह की अध्यक्षता कर रहे डॉ. प्रेम विज ने अपनी कविता के माध्यम से मानव के नकारात्मक और सकारात्मक पहलुओं को समान महत्व देने की बात कही। मुख्य अतिथि डॉ. माधव कौशिक ने अपनी कविताओं ‘इंतजार’, ‘सपना’ और ‘बचपन’ के जरिए कवि दरबार को बहुआयामी बनाया। उनकी कविता ‘अगली बार गांव जाकर अपना घर ढूंढूंगा…’ ने माहौल को भावुक कर दिया। अंत में, श्री जसवंत सिंह जफर ने अपनी कविता ‘अंधे एहि ना आखिण’ के माध्यम से मानवीय दृष्टिकोण के विभिन्न पहलुओं का जिक्र किया।
मंच संचालन सहायक निदेशक देविंदर कौर ने बखूबी किया। इस अवसर पर भाषा विभाग की उप निदेशक हरभजन कौर, चंदनदीप कौर और आलोक चावला, सहायक निदेशक अमरिंदर सिंह, जसप्रीत कौर, सुरिंदर कौर और राबिया, प्रख्यात विद्वान डॉ. महेश कुमार शर्मा गौतम, कवि डॉ. अमरजीत कौंके, डॉ. दर्शन सिंह आशट, अवतारजीत, संत सिंह सोहल, हरी सिंह चमक और नरिंदर शर्मा सहित बड़ी संख्या में श्रोता उपस्थित थे।

